लाइव सिटीज, पटना: बिहार में उद्योग और रोजगार को लेकर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बड़ा लक्ष्य तय किया है। सरकार अब राज्य के एक करोड़ परिवारों को उद्यमी परिवार बनाने की दिशा में काम करेगी। मुख्यमंत्री ने गुरुवार को पटना के बापू सभागार में मुख्यमंत्री उद्यमी योजना के चयनित लाभुकों के उन्मुखीकरण और प्रथम किस्त वितरण कार्यक्रम में इस लक्ष्य का ऐलान किया।
इसी कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने 7,136 लाभुकों के खातों में करीब 150 करोड़ रुपये की राशि भेजी। इन लाभुकों को मुख्यमंत्री उद्यमी योजना के तहत पहली किस्त के रूप में दो-दो लाख रुपये दिए गए हैं। सरकार का उद्देश्य युवाओं को नौकरी तलाशने वाले के बजाय रोजगार देने वाला उद्यमी बनाना है।
2030 तक बदलने की तैयारी
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा कि सरकार का लक्ष्य अगले कुछ वर्षों में बिहार की अर्थव्यवस्था और उद्योग के स्वरूप को बदलना है। इसके लिए उद्यमिता को गांव-गांव तक पहुंचाने पर जोर दिया जा रहा है।
सरकार की सोच सिर्फ कुछ बड़े उद्योग लगाने तक सीमित नहीं है। छोटे कारोबार, माइक्रो और स्मॉल इंडस्ट्री, स्थानीय उत्पादन और युवाओं के स्टार्टअप को बढ़ावा देकर बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करने की योजना है।
सरकार पहले ही अगले पांच वर्षों में बिहार में 10 हजार उद्योग स्थापित करने का लक्ष्य बता चुकी है। मुख्यमंत्री के मुताबिक करीब 1,000 उद्योगों को जमीन उपलब्ध कराई जा चुकी है।
मुख्यमंत्री उद्यमी योजना में कितना पैसा मिलेगा?
मुख्यमंत्री उद्यमी योजना के तहत चयनित लाभुक को अधिकतम 10 लाख रुपये तक की सहायता का प्रावधान है।
इसमें अधिकतम 5 लाख रुपये अनुदान/सब्सिडी के तौर पर और अधिकतम 5 लाख रुपये ब्याज मुक्त ऋण के रूप में दिए जाते हैं। यानी योजना के तहत उद्यमी को अपना कारोबार शुरू करने के लिए बड़ी शुरुआती आर्थिक मदद मिलती है।
मुख्यमंत्री युवा उद्यमी योजना में ऋण वाले हिस्से पर अलग प्रावधान के तहत 1 प्रतिशत वार्षिक ब्याज का नियम है। प्रशिक्षण और परियोजना की निगरानी के लिए भी प्रति इकाई 25 हजार रुपये तक खर्च का प्रावधान है।
150 करोड़ रुपये से शुरुआत, आगे बड़ा विस्तार
आज भेजी गई करीब 150 करोड़ रुपये की राशि को इस पूरी तस्वीर की शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है। 7,136 लाभुकों को पहली किस्त के रूप में दो-दो लाख रुपये दिए गए हैं।
वित्तीय वर्ष 2025-26 में भी मुख्यमंत्री उद्यमी योजना के तहत चयनित लाभुकों को राशि देने की प्रक्रिया चल रही है। सरकारी पोर्टल के मुताबिक इस वर्ष चयन और दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया पूरी की गई है।
यानी सरकार का फोकस एक बार पैसा देने पर नहीं, बल्कि नए उद्यमियों को कारोबार खड़ा करने, उत्पादन शुरू करने और बाजार उपलब्ध कराने पर है।
‘Made in Bihar’ को मिलेगी सरकारी खरीद में प्राथमिकता
इस योजना का सबसे बड़ा हिस्सा सिर्फ पैसा देना नहीं, बल्कि बिहार में बने उत्पादों के लिए बाजार तैयार करना है।
मुख्यमंत्री ने कहा है कि राज्य सरकार की खरीद में बिहार में तैयार होने वाले उत्पादों को प्राथमिकता दी जाएगी। इसके लिए सरकार ने पर्चेज प्रेफरेंस की व्यवस्था की बात कही है, जिसके तहत बिहार में बने उत्पादों को सरकारी खरीद में 25 से 40 प्रतिशत तक हिस्सेदारी मिल सकती है।
इसका मतलब यह है कि अगर बिहार का कोई उद्यमी मानक के अनुरूप स्टील, कपड़ा या दूसरे उत्पाद तैयार करता है, तो सरकारी संस्थानों की खरीद में स्थानीय उत्पाद को प्राथमिकता देने की व्यवस्था बनाई जाएगी।
50 करोड़ तक के टेंडर में स्थानीय उद्यमियों को फायदा
सरकार ने सरकारी टेंडर में भी बिहार के उद्यमियों को फायदा देने की योजना बताई है।
मुख्यमंत्री के अनुसार 50 करोड़ रुपये तक के सरकारी टेंडर में यदि बिहार का कोई उद्यमी L2, L3 या L4 पर आता है और वह L1 की दर पर काम करने को तैयार है, तो उसे काम देने का रास्ता बनाया जाएगा।
इससे स्थानीय कंपनियों को सरकारी काम मिलने की संभावना बढ़ेगी और बिहार में तैयार होने वाली कंपनियों को शुरुआती बाजार मिल सकेगा।
बाहर से सामान लाने की बजाय बिहार में उत्पादन
सरकार का जोर अब इस बात पर भी है कि बिहार केवल दूसरे राज्यों से सामान खरीदने वाला बाजार न रहे, बल्कि खुद उत्पादन करने वाला राज्य बने।
मुख्यमंत्री ने संकेत दिया है कि जहां बिहार में मानक के अनुरूप उत्पाद उपलब्ध होंगे, वहां बाहर से सामान मंगाने के बजाय स्थानीय उत्पादन को प्राथमिकता दी जाएगी।
यानी सरकार की रणनीति है—बिहार में उद्योग लगे, बिहार में उत्पादन हो और बिहार के लोगों को रोजगार मिले।
एक उद्यमी से कई लोगों को रोजगार
सरकार का मानना है कि अगर हजारों नए उद्यमी तैयार होते हैं तो इसका सीधा असर रोजगार पर पड़ेगा।
मुख्यमंत्री के अनुसार अगर करीब 44-45 हजार उद्यमी औसतन पांच-पांच लोगों को भी रोजगार देते हैं तो लगभग ढाई लाख लोगों के लिए सीधे रोजगार के अवसर तैयार हो सकते हैं। इसके अलावा सप्लाई, परिवहन, कच्चा माल और बाजार से जुड़े अप्रत्यक्ष रोजगार अलग पैदा होंगे।
यही मॉडल आगे एक करोड़ परिवारों तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है।
गांव और जिले के हिसाब से उद्योग पर जोर
सरकार अब क्लस्टर आधारित उद्योग को भी बढ़ावा देने की तैयारी में है। मुख्यमंत्री क्लस्टर विकास योजना 2026 के तहत ‘वन डिस्ट्रिक्ट, वन क्लस्टर’ और ‘वन डिस्ट्रिक्ट, वन प्रोडक्ट’ की दिशा में काम किया जाएगा।
इससे जिस जिले में जिस तरह के उत्पाद या पारंपरिक कारोबार की संभावना है, वहां उसी से जुड़े उद्योगों का क्लस्टर तैयार करने की कोशिश होगी।
इसका फायदा यह होगा कि एक ही क्षेत्र में कच्चा माल, उत्पादन, पैकेजिंग, परिवहन और बाजार की सुविधाएं विकसित की जा सकेंगी।
पलायन रोकना भी बड़ा लक्ष्य
बिहार सरकार के सामने रोजगार और पलायन की चुनौती भी बड़ी है। मुख्यमंत्री ने कहा है कि बिहार से करीब 12 लाख लोग मजदूरी के लिए दूसरे राज्यों में जाते हैं। सरकार का लक्ष्य है कि बिहार में ही इतने रोजगार के अवसर पैदा किए जाएं कि लोगों को रोजी-रोटी के लिए बाहर जाने की जरूरत न पड़े।
इसीलिए सरकार उद्योग, एमएसएमई, स्टार्टअप और उद्यमिता को एक साथ आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है।
बिजली, पानी और जमीन पर भी फोकस
नए उद्योगों के लिए केवल लोन या सब्सिडी पर्याप्त नहीं है। सरकार का कहना है कि औद्योगिक निवेश के लिए जमीन, बिजली, पानी और आधारभूत ढांचे पर भी काम किया जा रहा है।
मुख्यमंत्री के मुताबिक बिहार में बिजली की उपलब्धता में काफी वृद्धि हुई है और औद्योगिक जरूरतों को पूरा करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जा रहा है। सरकार निवेशकों को उद्योग लगाने के लिए सुरक्षा और जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने का भी भरोसा दे रही है।
‘Made in Bihar’ से क्या बदल सकता है?
अगर सरकार की यह रणनीति जमीन पर प्रभावी तरीके से लागू होती है तो इसका असर तीन स्तरों पर देखने को मिल सकता है।
पहला—स्थानीय युवाओं को अपना कारोबार शुरू करने का मौका मिलेगा।
दूसरा—बिहार में बने उत्पादों के लिए सरकारी खरीद के जरिए बड़ा बाजार मिल सकता है।
और तीसरा—स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ने से दूसरे राज्यों की ओर पलायन कम करने में मदद मिल सकती है।
यानी सरकार का मॉडल केवल ‘उद्यमी को पैसा देने’ तक सीमित नहीं है। इसमें पैसा, उत्पादन, सरकारी बाजार, टेंडर में अवसर और रोजगार—इन सभी को एक साथ जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
