लाइव सिटीज, पटना: राजधानी पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में विजयादशमी के अवसर पर 71वें भव्य रावण दहन समारोह का आयोजन किया गया। इस वर्ष 90 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन हुआ। बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देने वाला यह आयोजन आज बिहार की प्रमुख सांस्कृतिक परंपराओं में शामिल हो चुका है। हर साल इस आयोजन के जरिए लोगों को असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश दिया जाता है।
हालांकि, गांधी मैदान में रावण दहन की यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। इसके पीछे भारत-पाकिस्तान विभाजन का दर्द, विस्थापित परिवारों के संघर्ष और राष्ट्रीय एकता की एक ऐसी कहानी जुड़ी है, जो आज भी सामाजिक सौहार्द का संदेश देती है।
विभाजन के दर्द से हुई नई परंपरा की शुरुआत
गांधी मैदान में रावण दहन समारोह की शुरुआत के पीछे वर्ष 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। विभाजन के बाद पाकिस्तान के पंजाब प्रांत से कई हिंदू परिवार विस्थापित होकर पटना पहुंचे थे। अपने घर-बार छोड़कर आए इन परिवारों के सामने अपनी संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक पहचान को सहेजकर रखने की चुनौती थी।
ऐसे समय में इन लोगों ने धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से समाज में आपसी भाईचारे को मजबूत करने का प्रयास किया। इसी सोच ने आगे चलकर पटना में सामूहिक रावण दहन की परंपरा को जन्म दिया। इसका उद्देश्य केवल त्योहार मनाना नहीं, बल्कि लोगों को एक मंच पर लाकर सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाना भी था।
1954 में बनी श्री दशहरा कमिटी ट्रस्ट
इस परंपरा को व्यवस्थित रूप देने के लिए बख्शी राम गांधी, मोहन लाल गांधी, मदन लाल ग्रोवर और चमन लाल समेत अन्य लोगों ने वर्ष 1954 में ‘श्री दशहरा कमिटी ट्रस्ट’ की स्थापना की। समिति ने गांधी मैदान में विजयादशमी के अवसर पर रावण दहन का आयोजन शुरू करने की दिशा में पहल की।
इसके अगले वर्ष, यानी 1955 में, पहली बार गांधी मैदान में रावण दहन समारोह आयोजित किया गया। धीरे-धीरे यह आयोजन पटना की पहचान बनता गया और इसमें लोगों की भागीदारी बढ़ने लगी। समय के साथ रावण दहन का स्वरूप भी बदलता गया और यह एक बड़े सार्वजनिक सांस्कृतिक उत्सव के रूप में स्थापित हो गया।
15 से 20 फीट के पुतले से 90 फीट तक का सफर
शुरुआती वर्षों में रावण के पुतले की ऊंचाई महज 15 से 20 फीट हुआ करती थी। उस दौर में पुतले बनाने के लिए बांस, चटाई और साधारण कागज जैसी सामग्रियों का इस्तेमाल किया जाता था। आतिशबाजी भी सीमित स्तर पर होती थी और आयोजन का स्वरूप आज की तुलना में काफी साधारण था।
समय बीतने के साथ तकनीक और कारीगरी में बदलाव आया। रावण के पुतलों को अधिक आकर्षक और विशाल रूप दिया जाने लगा। अब इस आयोजन के लिए आगरा, दिल्ली और बनारस जैसे शहरों से कलाकारों और कारीगरों को बुलाया जाता है। पुतलों के निर्माण में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे उनकी बनावट और सजावट पहले से अधिक प्रभावशाली हो गई है।
आयोजन के विस्तार के साथ आतिशबाजी के स्वरूप में भी बदलाव आया है। पर्यावरण के अनुकूल आतिशबाजी को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि परंपरा को बनाए रखने के साथ पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी भी निभाई जा सके।
मुस्लिम कारीगरों की भागीदारी से मजबूत होता सांप्रदायिक सौहार्द
गांधी मैदान के रावण दहन समारोह की एक खास पहचान इसकी साझा सांस्कृतिक विरासत भी है। इस आयोजन में दशकों से मुस्लिम कारीगर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले बनाने में योगदान देते आ रहे हैं। यह परंपरा बताती है कि कला, मेहनत और सांस्कृतिक आयोजनों का संबंध किसी एक धर्म तक सीमित नहीं होता।
गया के मोहम्मद ताज और उनके परिवार की कई पीढ़ियां इस परंपरा से जुड़ी रही हैं। उनका योगदान इस बात का उदाहरण है कि त्योहारों और सार्वजनिक आयोजनों के जरिए विभिन्न समुदायों के लोग एक-दूसरे की परंपराओं का हिस्सा बनते हैं।
रावण के पुतलों के निर्माण में अलग-अलग समुदायों के कारीगरों की भागीदारी गांधी मैदान के आयोजन को सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक बनाती है। यहां धार्मिक आस्था के साथ-साथ साझा मेहनत, सहयोग और सामाजिक एकजुटता की भावना भी दिखाई देती है।
धार्मिक आयोजन से आगे बढ़कर बनी साझा सांस्कृतिक विरासत
पटना के गांधी मैदान का रावण दहन आज केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं रह गया है। यह बिहार की सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक एकता और आपसी भाईचारे का महत्वपूर्ण प्रतीक बन चुका है। विभाजन के बाद विस्थापित परिवारों द्वारा शुरू की गई यह पहल समय के साथ ऐसी परंपरा में बदल गई, जिसमें अलग-अलग समुदायों की भागीदारी देखने को मिलती है।
इस आयोजन का ऐतिहासिक महत्व इसलिए भी खास है, क्योंकि इसकी जड़ें उन लोगों के प्रयासों से जुड़ी हैं, जिन्होंने विस्थापन के कठिन दौर में अपनी संस्कृति को जीवित रखने और समाज को एकजुट करने का रास्ता चुना था।
आज गांधी मैदान में रावण दहन के दौरान जलता हुआ पुतला बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देता है। वहीं, इस आयोजन से जुड़ी इतिहास की कहानी लोगों को यह भी याद दिलाती है कि सामाजिक सौहार्द, आपसी सम्मान और राष्ट्रीय एकता ही किसी परंपरा को लंबे समय तक जीवित रखते हैं।
