लाइव सिटीज, पटना: बिहार के विश्वविद्यालयों में कुलपतियों (VC) के वित्तीय अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है। अब विश्वविद्यालयों से जुड़े बड़े वित्तीय फैसले केवल कुलपति के स्तर पर नहीं लिए जा सकेंगे। ऐसे मामलों में चांसलर यानी कुलाधिपति की मंजूरी लेना जरूरी होगा। इस बदलाव के बाद विश्वविद्यालयों में वित्तीय निर्णय लेने की प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक नियंत्रित हो गई है।
बड़े वित्तीय फैसलों पर अब चांसलर की अनुमति
नई व्यवस्था का असर विश्वविद्यालयों में होने वाले महत्वपूर्ण वित्तीय निर्णयों पर पड़ेगा। कुलपति अपने स्तर पर नियमित प्रशासनिक कामकाज संभाल सकेंगे, लेकिन ऐसे मामलों में जहां बड़े स्तर पर वित्तीय स्वीकृति या खर्च से जुड़ा फैसला लेना हो, वहां चांसलर की अनुमति आवश्यक होगी।
इसका उद्देश्य विश्वविद्यालयों में वित्तीय निर्णयों की निगरानी को मजबूत करना और बड़े खर्च से जुड़े मामलों में उच्च स्तर पर मंजूरी की व्यवस्था सुनिश्चित करना बताया जा रहा है।
VC के अधिकारों में क्या बदलाव हुआ?
अब कुलपतियों के पास पहले की तरह सभी बड़े वित्तीय मामलों में स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने की शक्ति नहीं होगी। विश्वविद्यालय प्रशासन को महत्वपूर्ण वित्तीय प्रस्तावों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाना होगा। इसके बाद संबंधित मामलों में चांसलर की स्वीकृति ली जाएगी।इस व्यवस्था से विश्वविद्यालयों में बड़े खर्च, वित्तीय दायित्व और महत्वपूर्ण आर्थिक फैसलों पर अतिरिक्त स्तर की निगरानी रहेगी।
विश्वविद्यालय प्रशासन पर क्या पड़ेगा असर?
इस बदलाव के बाद विश्वविद्यालयों को बड़े वित्तीय फैसले लेने से पहले प्रक्रिया और स्वीकृति के स्तर पर अधिक सावधानी बरतनी होगी। कुलपति और विश्वविद्यालय प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि जिन मामलों में चांसलर की मंजूरी अनिवार्य की गई है, उनमें बिना स्वीकृति के कोई बड़ा वित्तीय निर्णय न लिया जाए।
वहीं, नियमित और निर्धारित दायरे में आने वाले प्रशासनिक कार्यों को लेकर विश्वविद्यालयों की सामान्य कार्यप्रणाली जारी रहेगी। यानी बदलाव का मुख्य असर बड़े और महत्वपूर्ण वित्तीय निर्णयों से जुड़े अधिकारों पर है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव?
विश्वविद्यालयों में वित्तीय अधिकारों को लेकर समय-समय पर पारदर्शिता, जवाबदेही और खर्च की निगरानी का मुद्दा उठता रहा है। ऐसे में बड़े वित्तीय निर्णयों को चांसलर की मंजूरी से जोड़ने से निर्णय प्रक्रिया में एक अतिरिक्त निगरानी स्तर जुड़ता है।
अब विश्वविद्यालयों में किसी बड़े वित्तीय फैसले से पहले यह देखना होगा कि वह किस श्रेणी में आता है और उसके लिए किस स्तर की स्वीकृति जरूरी है। इससे कुलपतियों के वित्तीय अधिकारों की सीमा भी पहले की तुलना में अधिक स्पष्ट होगी।
