लाइव सिटीज, पटना: बिहार के विश्वविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर चल रहा विवाद अब समीक्षा के चरण में पहुंच गया है। 21 दिनों तक चले अनशन और आंदोलन के बाद असिस्टेंट प्रोफेसर अभ्यर्थियों की मांगों पर विचार करने के लिए चार सदस्यीय समिति गठित की गई है। राज्यपाल और आंदोलनरत अभ्यर्थियों के प्रतिनिधियों के बीच हुई बातचीत के बाद इस दिशा में सहमति बनी थी। अब समिति मौजूदा नियुक्ति नियमों और उससे जुड़े प्रावधानों की समीक्षा करेगी।
2026 के नियुक्ति नियमों पर उठे थे सवाल
बिहार में विश्वविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए वर्ष 2026 में नए नियम जारी किए गए थे। बिहार लोक भवन की वेबसाइट पर भी असिस्टेंट प्रोफेसरों की नियुक्ति, जिसमें संविदा नियुक्तियां भी शामिल हैं, से संबंधित 2026 के नियम दर्ज हैं। जुलाई 2026 में इन नियमों से संबंधित अधिसूचना और बाद में संशोधन संबंधी अधिसूचना भी जारी की गई थी।इन्हीं नियमों को लेकर अभ्यर्थियों और शोधार्थियों की ओर से आपत्ति जताई गई थी। आंदोलनरत अभ्यर्थियों का कहना था कि नियुक्ति प्रक्रिया में ऐसे बदलाव किए जाने चाहिए, जिससे योग्य अभ्यर्थियों को उचित अवसर मिल सके।
चार सदस्यीय समिति करेगी समीक्षा
अब गठित चार सदस्यीय समिति असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े अलग-अलग पहलुओं का अध्ययन करेगी। समिति विश्वविद्यालयों से आवश्यक जानकारी और रिकॉर्ड हासिल करेगी। इसके अलावा उच्च शिक्षा और नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े विशेषज्ञों की राय भी ली जाएगी, ताकि नियमों में बदलाव को लेकर ठोस सुझाव तैयार किया जा सके।समिति को अपनी रिपोर्ट 90 दिनों के भीतर सौंपने की जिम्मेदारी दी गई है। रिपोर्ट में नियुक्ति नियमों में किन बिंदुओं पर बदलाव की जरूरत है और प्रक्रिया को किस तरह अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है, इस पर सुझाव दिए जाने की उम्मीद है।
उम्र सीमा और लिखित परीक्षा पर भी चर्चा
आंदोलन के दौरान अभ्यर्थियों की ओर से नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े कई मुद्दे उठाए गए थे। इनमें असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती की अधिकतम उम्र सीमा को बढ़ाकर 55 वर्ष करने की मांग भी शामिल थी। इसके अलावा लिखित परीक्षा कराने और उसे वस्तुनिष्ठ स्वरूप में रखने का सुझाव दिया गया था।अभ्यर्थियों की ओर से यह भी मांग रखी गई थी कि लिखित परीक्षा में सफल उम्मीदवारों की मेरिट तैयार करते समय API स्कोर को शामिल किया जाए। शोध प्रकाशन और शिक्षण अनुभव को भी मूल्यांकन प्रक्रिया में उचित स्थान देने की मांग की गई थी।
शोध और अनुभव के मूल्यांकन पर भी जोर
अभ्यर्थियों ने शोध प्रकाशन और अनुभव को लेकर स्पष्ट मानक तय करने की मांग की थी। उनका कहना था कि चयन प्रक्रिया में शोध कार्य और अनुभव का मूल्यांकन पारदर्शी और स्पष्ट तरीके से होना चाहिए।समिति अब इन तमाम बिंदुओं पर उपलब्ध नियमों, विश्वविद्यालयों से मिलने वाली जानकारी और विशेषज्ञों की राय के आधार पर विचार करेगी।
अतिथि सहायक प्राध्यापकों की मांगें भी शामिल
इस पूरे मामले में केवल नियमित असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्ति ही नहीं, बल्कि अतिथि और संविदा सहायक प्राध्यापकों से जुड़े मुद्दे भी उठाए गए हैं। आंदोलन के दौरान अतिथि सहायक प्राध्यापकों के लिए न्यूनतम वेतनमान और महंगाई भत्ते जैसी मांगों पर भी चर्चा की गई थी
